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भारत में अधिकार कार्यकर्ताओं को एलजीबीटी लोगों के नाम मतदाता सूचियों से कटने की आशंका

नई दिल्ली में भारत निर्वाचन आयोग का भवन। 26 फ़रवरी 2016 की पुरानी तस्वीर। फ़ोटो: Ramesh Lalwani / Wikimedia Commons, CC BY 2.0। तस्वीर क्रॉप की गई, आकार घटाया गया और WebP में बदली गई।
नई दिल्ली में भारत निर्वाचन आयोग का भवन। 26 फ़रवरी 2016 की पुरानी तस्वीर। फ़ोटो: Ramesh Lalwani / Wikimedia Commons, CC BY 2.0। तस्वीर क्रॉप की गई, आकार घटाया गया और WebP में बदली गई।

भारत में एलजीबीटी अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि मतदाता सूचियों की व्यापक जाँच के कारण ट्रांसजेंडर लोगों और समुदाय के अन्य सदस्यों के नाम कट सकते हैं, खासकर उन लोगों के, जिनका अपने परिवार से संपर्क टूट चुका है। इन आशंकाओं के बारे में वॉशिंगटन ब्लेड ने 30 अक्टूबर 2026 को रिपोर्ट की। चिंता पहचान और रिश्तेदारों की जानकारी साबित करने में आने वाली कठिनाइयों को लेकर है। रिपोर्ट में ऐसे देशव्यापी आँकड़े नहीं हैं, जिनसे हटाए गए मतदाताओं में एलजीबीटी लोगों की हिस्सेदारी का अनुमान लगाया जा सके।

भारत निर्वाचन आयोग, जो एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, यह विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी Special Intensive Revision (SIR), कर रहा है। यह प्रक्रिया 2025 में बिहार से शुरू हुई और बाद में अन्य क्षेत्रों में फैली। ह्यूमन राइट्स वॉच ने 29 अक्टूबर की अपनी रिपोर्ट में कहा कि कुल मिलाकर 13 करोड़ से अधिक नाम सूचियों से हटाए गए हैं। संगठन इस प्रक्रिया को मनमाना और अपारदर्शी बताता है और इसे रद्द करने की माँग करता है। यह आँकड़ा सभी वर्गों के मतदाताओं का है; यह पंजीकरण खोने वाले एलजीबीटी लोगों की संख्या नहीं बताता।

स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में मतदाता की जानकारी का मिलान किसी पुरानी सूची से, कुछ राज्यों में 2002 की सूची से, या उसके रिश्तेदारों के रिकॉर्ड से किया जाता है। ऐसा संबंध स्थापित न होने पर अतिरिक्त दस्तावेज़ माँगे जा सकते हैं। परिवार द्वारा ठुकराए गए लोगों के लिए जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल के दस्तावेज़ प्राप्त करना कठिन हो सकता है। नाम या दस्तावेज़ों में दर्ज जेंडर बदलने के बाद पुराने और नए रिकॉर्ड की जानकारी में भी अंतर हो सकता है।

दक्षिण भारत के तमिलनाडु में द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने 23 मार्च को आयोग के आँकड़ों के हवाले से बताया कि SIR के बाद ‘थर्ड जेंडर’ श्रेणी के मतदाताओं की संख्या 9,464 से घटकर 7,617 रह गई, यानी 1,847 की कमी आई। ये आँकड़े पुनरीक्षण के एक खास चरण के हैं, अक्टूबर के अंत की अंतिम स्थिति के नहीं। इनमें सभी ट्रांसजेंडर मतदाता भी शामिल नहीं हैं, क्योंकि कुछ लोग पुरुष या महिला के रूप में पंजीकृत हैं। केवल इन संख्याओं से हर नाम हटाए जाने का कारण नहीं पता चलता।

कर्नाटक में My Vote, My Right गठबंधन ने 74 ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स लोगों का सर्वेक्षण किया। 13 जून की बैंगलोर मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, कोई भी उत्तरदाता 2002 की सूची में अपना मतदान केंद्र नहीं बता सका। प्रतिभागियों ने दस्तावेज़ खो जाने और परिवार छोड़ने के बाद रिश्तेदारों से संपर्क न कर पाने की बात कही। गठबंधन ने पात्र नागरिकों के नाम कटने के खतरे की चेतावनी दी। ये निष्कर्ष इस छोटे सर्वेक्षण में शामिल लोगों तक सीमित हैं।

भारत में एलजीबीटी अधिकार कार्यकर्ता अंकित भूपतानी ने वॉशिंगटन ब्लेड से बातचीत में सुझाव दिया कि जाँच में स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेज़ों की सूची में ट्रांसजेंडर लोगों के सरकारी पहचानपत्रों का स्पष्ट उल्लेख हो। उन्होंने ‘थर्ड जेंडर’ श्रेणी में नाम हटाने के आँकड़े कारणों के अनुसार प्रकाशित करने की भी माँग की: मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि, पते पर अनुपस्थिति या दस्तावेज़ों में अंतर। उनके अनुसार इससे मतदान के दिन से पहले गलतियाँ पहचानने में मदद मिलेगी।

आयोग का आधिकारिक पक्ष विधि और न्याय मंत्रालय के 25 जुलाई के संसदीय जवाब में दिया गया है: पुनरीक्षण का उद्देश्य मृत लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है, साथ ही सभी पात्र मतदाताओं का पंजीकरण बनाए रखना है। मंत्रालय का कहना है कि नाम जाँच के बाद हटाए जाते हैं और नागरिकों के पास निर्धारित अवधि में दावे और आपत्तियाँ दर्ज करने तथा फैसलों के खिलाफ अपील करने के अवसर हैं। घोषित सुरक्षा उपायों में कर्मचारियों का पतों पर बार-बार जाना और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की भागीदारी शामिल है।

दिल्ली के निर्वाचन कार्यालय ने 24 सितंबर की सूचना में बताया कि उसने एक दिन पहले बेघर लोगों, ट्रांसजेंडर लोगों और यौनकर्मियों के लिए विशेष पंजीकरण शिविर लगाए थे। कर्मचारियों ने सूची में नाम जोड़ने के आवेदन भरने में मदद की और पंजीकरण तथा रिकॉर्ड में सुधार के फॉर्म स्वीकार किए। शिविर रैन बसेरों और इन समूहों के ठहरने के अन्य स्थानों पर लगाए गए थे।

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