ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों के लिए शिक्षक पदों तक पहुंच पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में दिल्ली के अधिकारियों से पूछा कि शिक्षक पदों की रिक्तियां पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग क्यों घोषित की जाती हैं और इस व्यवस्था में ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों को किस तरह शामिल किया जाता है। नवभारत टाइम्स ने 21 अक्टूबर को इसकी खबर दी।
अदालत के आदेश में पूछा गया है कि दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) की भर्ती अधिसूचनाओं पर कौन से नियम लागू होते हैं। अदालत जानना चाहती है कि क्या ये नियम लिंग के आधार पर रिक्तियां बांटना अनिवार्य करते हैं। यदि नहीं, तो अधिकारियों को इस बंटवारे का उद्देश्य बताना होगा; यदि हां, तो इसके इस्तेमाल का औचित्य स्पष्ट करना होगा। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या अधिसूचनाओं में तीसरे लिंग की श्रेणी शामिल करने की योजना है।
याचिकाकर्ताओं में भारतीय शिक्षिका और ट्रांसजेंडर महिला जेन कौशिक भी हैं। LawChakra के अनुसार, वह ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अलग शिक्षक रिक्तियां, उम्र और न्यूनतम योग्यता की शर्तों में छूट तथा सरकारी नौकरियों में उनकी भर्ती के नियम मांग रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल को ही उन्हें अधिसूचना में बताए गए लिंग की परवाह किए बिना ट्रांसजेंडर श्रेणी में आवेदन करने की अनुमति दे दी थी।
प्रवीण सिंह की संबंधित याचिका उम्र संबंधी शर्तों में छूट से जुड़ी है। ANI की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर लोगों के सामने आने वाले सामाजिक-आर्थिक भेदभाव को देखते हुए अपने सेवा नियमों के तहत उम्र की शर्तों में छूट देने की शक्ति का इस्तेमाल क्यों नहीं किया।
प्रतिवादियों को आदेश की तारीख से 15 दिन के भीतर हलफनामे दाखिल करने को कहा गया है। याचिकाकर्ता 19 नवंबर को तय अगली सुनवाई से पहले उनका जवाब दे सकेंगे। यह आदेश अभी विवाद के गुण-दोष पर फैसला नहीं करता और अपने आप में कोई नया आरक्षण या भर्ती नियम लागू नहीं करता।


