“क्वीर इंटरसेक्शनैलिटी” — दक्षिण एशिया में एलजीबीटीक्यू+ जीवन, जाति और संस्कृति पर निजारा हजारिका और नम्रता पाठक की पुस्तक
दक्षिण एशिया में जाति, धर्म, लिंग और संस्कृति के संदर्भ में क्वीर समुदायों का एक अध्ययन।

19 जुलाई 2026 को ब्रिटिश अकादमिक प्रकाशक रूटलेज (Routledge) ने अंग्रेजी में Queer Intersectionality: Voices, Struggles, and Identities in South Asia नामक शोध संकलन प्रकाशित किया। इस पुस्तक का संपादन और सह-लेखन भारतीय शोधकर्ताओं निजारा हजारिका (Nizara Hazarika) और नम्रता पाठक (Namrata Pathak) ने किया है। यह ग्रंथ अकादमिक श्रृंखला South Asian Literature in Focus के तहत जारी किया गया है।
निजारा हजारिका असम के सोनापुर कॉलेज में अंग्रेजी स्नातकोत्तर विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, जो जेंडर और कामुकता अध्ययन, महिला लेखन और विकलांगता अध्ययन में विशेषज्ञता रखती हैं। नम्रता पाठक मेघालय में नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, जो पूर्वोत्तर भारतीय साहित्य की शोधकर्ता हैं और लंदन विश्वविद्यालय के सोआस (SOAS) में चार्ल्स वालेस इंडिया ट्रस्ट की फेलो रह चुकी हैं। संपादकों का मुख्य उद्देश्य क्वीर सिद्धांत का वि-औपनिवेशीकरण (decolonization) करना है: पश्चिमी ज्ञानमीमांसा के दायरे से बाहर निकलकर दक्षिण एशियाई वास्तविकताओं के संदर्भ में कामुकता और पहचान का विश्लेषण करना, जहां जेंडर जाति व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं, वर्ग और क्षेत्रीय पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यह पुस्तक भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और अफगानिस्तान में क्वीर समुदायों के अनुभवों और सांस्कृतिक आख्यानों का साहित्यिक आलोचना, डिजिटल मानविकी और नृवंशविज्ञान के माध्यम से विश्लेषण करती है। पहले खंड में लेखक पूर्व-औपनिवेशिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के जरिए क्षेत्र में लैंगिक तरलता (gender fluidity) की ऐतिहासिक जड़ों को रेखांकित करते हैं। इसमें पालि बौद्ध ग्रंथों (विशेष रूप से विनयपिटक) में लिंग परिवर्तन की कथाओं और हिंदू महाकाव्यों में रामायण के इला और महाभारत के शिखंडी के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान की पड़ताल की गई है। इसके साथ ही भारत और बांग्लादेश में हिजड़ा समुदाय तथा पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बचा पोश परंपरा का अध्ययन करते हुए पश्चिमी नैदानिक श्रेणियों के अंधानुकरण के प्रति सचेत किया गया है।
दूसरा खंड समकालीन सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक प्रतिरोध की पड़ताल करता है। कम्प्यूटेशनल टेक्स्ट माइनिंग विधियों का उपयोग करके शोधकर्ताओं ने दक्षिण एशिया में एलजीबीटीक्यूआईए+ व्यक्तियों के अनुभवों की भाषा को डिकोड किया है। अध्यायों में बढ़ते रूढ़िवाद के बीच डिजिटल सुरक्षित स्थानों के निर्माण और 2016 में रूपबान पत्रिका के संस्थापकों की हत्या के बाद बांग्लादेश में कार्यकर्ताओं की स्थिति का विवरण दिया गया है। सिनेमा के क्षेत्र में केरल के मलयालम सिनेमा में क्वीरबेटिंग (queerbaiting) की रणनीतियों और 21वीं सदी के बंगाली सिनेमा में लेस्बियन आख्यानों के विकास का विश्लेषण किया गया है।
अंतिम खंड भौगोलिक और सामाजिक सीमाओं के उल्लंघन पर केंद्रित है। इसमें असम में जेंडर-तटस्थ शौचालयों के लिए चलाए गए नागरिक अभियान (#NoMoreHoldingMyPee) और समकालीन उपन्यासों का अध्ययन शामिल है। इसमें श्याम सेल्वादुरई (Funny Boy), आर. राज राव (The Boyfriend), देवदत्त पटनायक (The Pregnant King), नेमत सादात (The Carpet Weaver) और नेपाली लेखक निरंजन कुंवर के संस्मरण शामिल हैं। ये शोध युद्ध और प्रवासन में पुरुषों की संवेदनशीलता, समलैंगिक संबंधों में घरेलू हिंसा और क्वीर सक्रियता तथा धार्मिक संस्थानों के बीच संवाद की संभावनाओं को रेखांकित करते हैं।






